Wednesday, December 5, 2007

धर्मपुत्र - आचार्य चतुरसेन

धर्मपुत्र - लाठीमार लेखक की सरल रचना

आचार्य चतुरसेन इस उपन्यास की भूमिका में अपने आपको एक "लाठी ब्रांड साहित्यकार" कहते हैं| यह उपन्यास हालांकि उस स्तर के थोड़ा नीचे ही है, आचार्य जी की सोच फिर भी कुछ जगहों पर दिख जाती है| आजकल के नकली उदारवाद और दिखावे के जमाने में उनके जैसे खरी खोटी लिखने वाला शायद ही कोई दूसरा मिले| इसीलिए उनके साहित्य का महत्त्व और भी बढ़ जाता है|

उपन्यास की कहानी काफी रोचक और सनसनीखेज है| यह आजादी की लड़ाई की पृष्ठभूमि में बड़े होते एक नौजवान दिलीप की कहानी है| भारतीय संस्कृति की सदियों से विदेशियों के हाथों होती दुर्दशा को देखकर यह विचारशील नौजवान हिंदू धर्म का कट्टर हिमायती बन जाता है| उसकी सोच यह है कि अगर भारत को फिर से उभरना है तो हिंदू जाति को हर क्षेत्र में एकजुटता दिखानी होगी| इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका और जापान जैसे देश भी राष्ट्रीय और जातीय एकता के कारण संसार में अपना दबदबा बनाए बैठे हैं| अतः भारत का उत्थान भी राष्ट्रीय एकता और जातीयता के बल पर ही हो सकता है|

अब अगर ऐसे नौजवान को यह बताया जाए कि वह जन्म से हिंदू नहीं बल्कि मुसलमान है और उसकी सिर्फ परवरिश हिंदू परिवार में की गई है तो उस पर क्या बीतेगी? क्या जन्म का धर्म परवरिश के धर्म से ज्यादा महत्त्व रखता है ? जिस व्यक्ति के लिए धर्म ही उत्थान का मार्ग था क्या उसकी सहानुभूति के पात्र अब एकदम से बदल जायेंगे? यही कुछ सवाल थे जिन्होंने मुझे यह उपन्यास पढने पर मजबूर किया था और यहीं आचार्य जी ने मुझे निराश किया| मेरे हिसाब से कहानी में ऐसा नाटकीय मोड़ लाने के बाद आचार्यजी ने इसका भरपूर फायदा नहीं उठाया| मैं सोच रहा था कि ऐसे रहस्य के खुलने के बाद दिलीप की मनोस्थिति को विस्तार से जांचा जायेगा - उसके दिमाग में क्या विचार और क्या वाद-विवाद चलेंगे? उसकी सोच क्या अब भी उतनी धर्मावलम्बित रहेगी? या वो सब धर्मों की बराबरी का दावा करने लगेगा? और या वो एक कट्टर मुसलमान बन जायेगा? इन सब सवालों के जवाबों के बारे में मैंने उपन्यास शुरू करने से पहले से ही अटकलें लगानी शुरू कर दी थी| यहां धर्म, दर्शन और समाज की एक गम्भीर चर्चा छेड़ी जा सकती थी| लेकिन यह मौका व्यर्थ जाने दिया गया| पहली बात तो यह कि दिलीप के जन्म का रहस्य किताब के कुछ आखिरी पन्नों में ही खोला जाता है और तब भी बस एक-दो वाक्यों में ही इस मुद्दे को निपटा दिया जाता है| यह भी हो सकता है कि आचार्यजी ने उपन्यास को ज्यादा गम्भीर न बनाने के इरादे से ऐसा किया हो| इस घटना से पहले उपन्यास काफी तेज रफ़्तार से दौड़ता है और हो सकता है कि उन्होंने उस गति को धीमा न करना ठीक समझा हो

कहानी में चाहे हमें दिलीप के कुछ विचारों से सांझा न किया गया हो, लेकिन आचार्यजी के अपने विचार राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणियों के रूप में हमें पढने को जरूर मिलते हैं| यहीं उनकी बेबाक और निडर सोच की कुछ झलक हमें मिलती है| उस समय के नवाबों की सनक, नेहरू-सुभाष की प्रतिद्वंदिता, गाँधी, जिन्ना, मुस्लिम लीग - इन सब की चर्चा और आलोचनाएं आपको इस उपन्यास में मिलेंगी| उनके अनुसार इस्लाम और हिन्दू परस्पर विरोधी धर्म हैं| इस्लाम धर्म होने के साथ-साथ एक राजनीतिक संगठन का ज़रिया भी है| आज़ादी मिलने पर कुछ मुसलमान नेताओं को प्रजा रह चुके हिन्दुओं की बराबरी कतई पसन्द नहीं आ सकती थी| मुस्लिम लीग और अंततः पाकिस्तान की स्थापना के पीछे भी यही भावना छुपी हुई थी| आचार्यजी के लिए आजादी मिलना महज अंग्रेजों से छुटकारा नहीं था, बल्कि भारत की सदियों पुरानी गुलामी का अंत था| बंटवारे के समय की दिल्ली का हाल उन्होंने इन शब्दों में बयान किया है –

"शहर में सिक्ख शरणार्थी और राष्ट्रीय संघ के तरुण बिफरे बाघ की भांति सीना ऊंचा करके घूम रहे थे दिल्ली ने सात सौ वर्षों के बाद ये दिन देखे थे यह दिल्ली तो वास्तव में मुसलमानों की ही नगरी थी यहां की भाषा, रंगत, अमीरी, नज़ाकत, शहरियत सभी कुछ मुसलमानों का था सात सौ वर्ष तक हिन्दू अर्ध-दासता भोगते रहकर दिल्ली की चौखट पर माथा टेकते रहे थे उसी दिल्ली को, वैसा ही भरा-पूरा गुलज़ार छोड़, उसपर हसरत की नज़र डालते हुए, उसकी सम्पन्न सड़कों पर सदा के गुलाम हिन्दुओं को शेर की तरह घूमते देखते हुए वे (मुसलमान) चले जा रहे थे यह कालचक्र का परिवर्तन था, जो अभूतपूर्व था "

कुल मिलाकर मैं यह समझता हूँ कि यह एक उत्तम दर्जे का उपन्यास है जो एक पल के भी पाठक को बोर नहीं होने देता| आचार्यजी के बारे में मैंने पढ़ा था कि वे अति शुद्ध हिन्दी का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इस कहानी की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए आम बोलचाल की भाषा ही प्रयोग की गई है| हो सकता है कि आप उनके राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हों, लेकिन उनकी लेखनी से प्रभावित हुए बिना रहना बहुत मुश्किल है| आखिर के 30-40 पन्ने तो इतने दिलचस्प और रोमांचक हैं कि हिन्दी की अच्छी से अच्छी फिल्म भी उनके सामने फीकी पड़ जाए|

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